Tuesday, August 15, 2017

ellite इलीट मीनिंग इन हिंदी

1.            Where they'll benefit just a few of the elite.
जहाँ सिर्फ़ एक अभिजात वर्ग के कुछ लोग इसका लाभ लेंगे।

2.            They are the elite. They are our leaders.
ये समाज के उत्कृष्ट भाग के सदस्य हैं, यही हमारे नेता हैं

3.            And the Chinese gave this small ruling elite
और चीन ने हमें ये छोटासा अभिजात शासक वर्ग दिया था

4.            Well, because an elite and its facilitators
ऐसा हुआ क्योंकि एक अभिजात वर्ग और उसके सहायक

5.            To secretly film meetings with members of the ruling elite,
गुप्त रूप से शासित वर्ग के सदस्यों की बैठक की फिल्म बनाने को

6.            The blind, the elite, the amateur runners,
नेत्रहीन, अभिजात वर्ग, शौकिया धावक,

7.            And a tiny, very wealthy elite
और एक बहुत ही छोटा समृद्ध वर्ग था

8.            For the elite administrators (Laughter) who kept track of accounts for the empires.
उन संभांत आकाओं के लिये (हँसी) जो साम्राज्यों का हिसाब रखते थे।

9.            I'm talking about the elite.
मैं कुलीन लोगो की बात कर रहा हूँ

10.          It was an elite concept.
यह एक विशिष्ट अवधारणा थी.
11.          It concerned people who were gentlemen belonging to the elite of the society-cultured , educated and highly intelligent .
यह मुकदमा उन सुसंस्कृत , शिक्षित और प्रबुद्ध लोगों से संबंधित था , जो समाज के अभिजात वर्ग से आते थे .

12.          1948 The Mai Baaps : The Indian Administrative Service has traditionally been dominated by the upper-class English speaking elite of the country .
माई-बापः भारतीय प्रशासनिक सेवा में उच्च वर्ग के अंग्रेजी बोलने वाले देश के अभिजात वर्ग का बोलबाल रहा है .

13.          That's what Bart Womack, a command sergeant major of the elite 101 st Airborne Division, asked himself as a grenade rolled past him after 1 a.m. on Sunday at an American camp in Kuwait.
कुवैत में अमेरिकी शिविर में रविवार को दोपहर 1 बजे 101 वीं एयरबोर्न प्रखण्ड के कमान सारजेण्ट मेजर बार्ट वोमैक ने अपने निकट एक ग्रेनेड फेंके जाने पर यही कहा।

14.          The Indian team wins the Junior World Cup in Hobart and the seniors , pipped at the post at the Olympics , win the Champions Challenge in Kuala Lumpur and find their way into the elite Champions Trophy after six years .
भारतीय टीम ने होबार्ट में जूनियर विश्व कप ट्रॉफी जीती और सीनियर टीम ओलंपिक में अटकी , कुआललंपुर में चैंपियंस चैलेंज ट्रॉफी जीती और छह साल बाद चैंपियंस ट्रॉफी में जगह पाई .

15.          He envisaged such a commonwealth to be a three-tier pyramid consisting of the common people , that is , slaves at the base and the ruling elite or ' guardians ' at the summit with the intermediate class of soldiers in between them .
उसकी परिकल्पना के अनुसार यह राष्ट्रकुलएक त्रि-स्तरीय पिरामिड था , जिसके अधोभाग में गुलाम अथवा सामान्य लोग थे और शिखर पर श्रेष्ठ वर्ग के शासक अथवा अभिभावक या संरक्षक होते थे .

16.          At the elite level, for example the former jihad theorist, Sayyid Imam al-Sharif (a.k.a. Dr. Fadl), now denounces violence: “We are prohibited from committing aggression,” he writes, “even if the enemies of Islam do that.”
उदाहरण के लिये कुलीन स्तर पर भी पूर्व जिहाद आतंकवादी ( अक्का डा. फद्ल ) ने भी हिंसा की निंदा की है, “ हमें आक्रामकता करने से प्रतिबंधित किया गया हैवे लिखते हैं, “ यदि इस्लाम के शत्रु भी ऐसा करें तो भी

17.          The vast Red Mosque complex, also known as the Lal Masjid , geographically in the midst of Pakistan's ruling institutions, boasts long-standing connections to the regime's elite, and includes huge male and female madrassas. But, turning on its benefactors, Kalashnikov-toting burqa-clad students confronted the police in January 2007 to prevent them from demolishing an illegally constructed building.
परन्तु 2007 में बुर्का पहनी महिलायें अपने सहायकों के विरूद्ध ही काल्शनिकोव लेकर खड़ी हो गईं और एक अवैध निर्माण को ढहाने का विरोध करने लगीं।

18.          Elite opinion ascribes the French intifada only to faults in French society , such as unemployment and discrimination. When one leading intellectual, Alain Finkielkraut , dared bring Islam into the discussion, he was criticized savagely and threatened with a libel lawsuit, so he backed down.
कुलीन जनमानस ने फ्रांस के इंतिफादा को फ्रांस के समाज में एक कमी के रुप में चित्रित किया जैसे बेरोजगारी और भेदभाव. जब एक प्रमुख बुद्धिजीवी एलेन फिंकिल क्रॉट ने इस्लाम को चर्चा में लाने का प्रयास किया तो उनकी बुरी तरह आलोचना हुई और उनपर मुकदमा चलाने की धमकी दी गई जिससे वे पीछे हट गए .

19.          Davis Cup non-playing captain Ramesh Krishnan , whose job it is to shepherd the national team out of the Asia-Oceania zone and into the elite 16-team World Group , believes there is a reason to be concerned : “ Our tournaments may become breeding grounds for foreigners who come and pick up prize money and experience . ”
ड़ेविस कप के न खेलने वाले कप्तान रमेश कृष्णन भी , जिनका काम राष्ट्रीय टीम को एशिया-ओशियाना क्षेत्र से पार कराकर अभिजात 16 टीमों के विश्व समूह में फंचाना है , मानते हैं , ' ' हमारे टूर्नामेंट विदेशियों के पलने-बढेने का मौका बन सकते हैं जो यहां आकर पुरस्कार राशि और अनुभव बटोर ले जाते हैं . ' '

20.          In the years that mattered, Ali drove a wedge between the races. This may not have been evident to the cultural elite, but anyone who had been at Gary or like venues would know exactly what I mean. He routinely denigrated black heroes who did not share his point of view, Joe Louis, Jackie Robinson, and Thurgood Marshall among them.
मुहम्मद अली अपराध भाव से मुक्त यौनाचारी था उसने प्लेब्वाय पत्रिका को बताया कि इस्लामी विश्व में पुरुष ही प्रमुख है महिला पीछे रहती है और अपने लिए कुछ नहीं चाहती .उसने यह 1975 में लिखा था जबकि समान अधिकार संशोधन के लिए 3 वर्षों का संघर्ष चल चुका था .महिलावादी अब भी इस विषय पर लड़ते रहते हैं.

अखिल भारतीय सत्संग मंडल (पंजी०) एवम जागृति परिवार (पंजी०) द्वारा मोमेंटो देकर सम्मानित किया


मंगलवार, 15 अगस्त 2017 को GH-8, सैयद नांगलोई चौक, पश्चिम विहार, नई दिल्ली में अखिल भारतीय सत्संग मंडल (पंजी०) एवम जागृति परिवार (पंजी०) के संयुक्त तत्वाधान में श्री दामोदर यादव द्वारा आयोजित श्री कृष्ण जन्माष्टमी जन्मोत्सव समारोह में आपके साथी पत्रकार रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया, (डिप्टी डिवीज़न वार्डन, नागरिक सुरक्षा निदेशालय, पश्चिमी दिल्ली) को संस्था के पदाधिकारियों द्वारा मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया

मै अखिल भारतीय सत्संग मंडल (पंजी०) एवम जागृति परिवार (पंजी०) दोनों संस्थाओ के पदाधिकारियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ

Sunday, July 2, 2017

न्यूज लिखते समय सावधानियां

न्यूज लिखते समय सावधानियां
 अपने विचार न दे
 पहले न्यूज पर मंथन करें फिर हेडलाइन लिखें ।
 जब आप एक्सपर्ट हो तब पहले हेडलाइन लिखें उसके बाद एकोरडिंग न्यूज लिखें ।
 एंकर स्टोरी में न्यूज के विषय में लिखेगें लेकिन अपनी राय नही देगें ।
 यदि खबर जिस स्थान के बारे में लिखें उस स्थान को हेडलाइन में अवश्य लिखें ।
 लेख मे खबर के गहरायी में जाकर उसके विभिन्न पहलुओं
पर विश्लेषण करेगें ।जबकि न्यूज बनाते समय मुख्य विन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए ।
 पत्रकार होने की वजह से आप न्यूज की तह में जायेगें और दिमाग मे मंथन कर उस न्यूज का प्रभाव संभावित लोगों पर कैसे पडेगा ,जरुर पूछें ।

Tuesday, February 28, 2017

किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों।

आजादी के 69 साल बाद भी हमारे देश का नागरिक आजाद नहीं है। देश आजाद हो गया, लेकिन देशवासी अभी भी बेड़ियों के बन्धन में बन्धे हैं। ये बेड़ियां हैं अज्ञानता की, जातिवाद की, धर्म की,आरक्षण की, गरीबी की, सहनशीलता की,मिथ्या अवधारणाओं की आदि आदि।
किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों। आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं, क्यों जातिवाद की बेड़ियां हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं?, क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है? क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है वही, आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है, क्यों हम इतने सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा कब लांघ जाते हैं, इसका एहसास भी नहीं कर पाते?
क्यों हमारे पूर्वजों द्वारा कही बातों के गलत प्रस्तुतीकरण को हम समझ नहीं पाते? क्यों हमारे देश में साक्षरता आज भी एक ऐसा लक्ष्य है जिसको हासिल करने के लिए योजनाएं बनानी पड़ती हैं? क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं, जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को क्यों मजबूर है?
क्या वाकई में हम आजाद है? क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था, उसके आम आदमी का वर्तमान इतना दयनीय क्यों है? क्या हममें इतनी क्षमता है कि अपने पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना कर सकें और समझ सकें।
दरअसल, जीवन पथ में आगे बढ़ने के लिए बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इतिहास गवाह है युद्ध सैन्य बल की अपेक्षा बुद्धि बल से जीते जाते हैं।
किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करते हैं। पुराने जमाने में सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी, तो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए बाहुबल एवं सैन्य बल का प्रयोग होता था। विजय रक्त रंजित होती थी।
जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया। मानव व्यवहार सभ्य होता गया, जिस मानव ने बुद्धि के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि पर राज किया आज वह उसी बुद्धि का प्रयोग एक दूसरे पर कर रहा है।
कुछ युद्ध आर-पार के होते हैं, आमने-सामने के होते हैं, जिसमें हम अपने दुश्मन को पहचानते हैं, लेकिन कुछ युद्ध छद्म होते हैं, जिनमें हमें अपने दुश्मनों का ज्ञान नहीं होता। वे कैंसर की भांति हमारे बीच में हमारे समाज का हिस्सा बन कर बड़े प्यार से अपनी जड़े फैलाते चलते हैं और समय के साथ हमारे ऊपर हावी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
इस रक्तहीन बौद्धिक युद्ध को आप बौद्धिक आतंकवाद भी कह सकते हैं। कुछ अत्यंत ही सभ्य दिखने वाले पढ़े-लिखे सफेद पोश तथाकथित सेकुलरों द्वारा अपने विचारों को हमारे समाज हमारी युवा पीढ़ी हमारे बच्चों में बेहद खूबसूरती से पाठ्यक्रम, वाद विवाद, सेमीनार,पत्र पत्रिकाओं, न्यूज़ चैनलों आदि के माध्यम से प्रसारित करके हमारी जड़ों पर निरन्तर वार किया जा रहा है।
यकीनन इस प्रकार तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी उन्हें सही समझने की भूल कर बैठता है। बौद्धिक आतंकवाद का यह धीमा जहर पिछले 69 सालों से भारतीय समाज को दिया जा रहा है और हम समझ नहीं पा रहे।

Monday, February 27, 2017

रैगर समाज के शहीद श्री रामू लाल गाड़ेगाँवलिया की शौर्य गाथा

राजस्थान की मिट्टी वीरो के शौर्य और बलिदान के लिए मशहूर है। यहां के योद्धाओं की गाथाएं आज भी बड़े गर्व से सुनाई जाती हैं। आज हम राजस्थान के भादवा गाँव के ऐसे ही वीर सपूत की गाथा याद कर रहे जो अपने जीवन को देश के लिए कुर्बान कर देने वाला, पल-प्रति-पल मौत के साये में बैठे रहने वाला, अपने घर-परिवार से दूर नितांत निर्जन में कर्तव्य निर्वहन करने वाला जाँबाज़ भारत माता के वीर सपूत श्री रामू लाल गाड़ेगावलिया की l
बात पुरानी तो है, लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं कि उसे भूला दिया जाये। बस बीस साल पहले 25-26 मई 1997 की ही तो बात है... जब जम्मू कश्मीर के डोडा जिले में वीर सपूत भारत माता के लाल रामू लाल गाड़ेगावलिया ने दुश्मन के गोले, बारूद और तोपों का सामना करना और चुन-चुन कर पाकिस्तानी घुसपैठियों का सफाया करना शुरू कर दिया था । वो गोलियों की बौछार से डरने वाला नहीं था ये वीर सिपाही अपनी टुकड़ी के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा, जहाँ दुश्मन घात लगाये ऊँची चोटी पर बैठे इस ताक में थे कि कब उन्हें कोई भारतीय जवान दिखे, ऐसे में ये वीर सिपाही अपनी जान की परवाह किये बिना आगे बढ़ता रहा। हमला करते हुए उन्होंने दुश्मन के दो आतंकवादियो को को मार गिराया,  इसी दौरान उनके दुश्मन की गोलियां लगीं तथा देश की सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगति को प्राप्त हुए l
वीर सपूत शहीद रामू लाल गाड़ेगावलिया का जन्म जयपुर जिले के सांभर तहसील के भादवा गाँव में श्री हरनाथ जी गाड़ेगावलिया व् श्रीमती मांगी देवी के घर 1 जुलाई 1972 को जन्मे । आपने अपनी प्रारम्भिक एव माध्यमिक शिक्षा भादवा से की 12 वीं भेसलान से और बी ए राजकीय शाकम्भरी महाविधालय सांभर से 1993 में उतीर्ण की । शहीद के छ भाई व् एक बहिन है बड़े भाई भंवर लाल गाड़ेगावलिया अध्यापक है तथा तीन अन्य भाई में से एक पंजाब में रोजगार करते एक राज पुलिस में कास्टेबल तथा फोज में कार्यरत है । शहीद 9 फरवरी 1994 इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस फोर्स में देश की सेवा करने के लिए भर्ती हुए थे ।
दिनाक 8 मई 2016 रविवार को शहीद रामूलाल की प्रतिमा का अनावरण केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने किया। मंत्री, विधायक व सरपंचों ने मूर्ति पर पुष्प चक्र अर्पित किए। इस दौरान केन्द्रीय सुरक्षा बल के कमांडों ने सलामी दी। कार्यक्रम के दौरान कर्नल राठौड़ व विधायकों सहित सांभर विधानसभा क्षेत्र से आए सरपंचों ने शहीद रामूलाल की माता मांगी देवी का शॉल ओढाकर सम्मान किया व भाइयों का भी किया सम्मान किया। प्रतिमा का अनावरण के बाद समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री कर्नल राठौड़ ने कहा जो शहीद देश के सम्मान की रक्षा के लिए आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हो जाते हैं। उन्हें समाज की आने वाली पीढिय़ां हमेशा याद करेगी। फुलेरा विधायक निर्मल कुमावत ने कहा कि रामूलाल के परिवार के चार लोग आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कराने के प्रयास करने का आश्वासन दिया।
इस अवसर पर निवाई (टोंक) विधायक हीरा लाल रैगर, धोद (सीकर)  विधायक गोर्धन लाल वर्मा, राम सहाय वर्मा राष्टीय महासचिव अखिल भारतीय रैगर महासभा, राष्टीय प्रचार सचिव मुकेश कुमार गाड़ेगावलिया पत्रकार अखिल भारतीय रैगर महासभा, डॉ एस के मोहंपुरिया प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय रैगर महासभा, जोबनेर चेयरमैन ज्ञान चंद जाजोरिया समारोह अध्यक्ष फुलेरा विधायक निर्मल कुमावत, फुलेरा नगरपालिका अध्यक्ष नृसिंग नारनोलिया, राजस्थान प्रदेश महासचिव बीरबल बुनकर, सांभर प्रधान बबली कंवर, जयपुर जिला परिषद सदस्य मंजू कुमावत, रेनवाल नगरपालिका अध्यक्ष सुमन कुमावत, सांभर नगर पालिका अध्यक्ष विनोद सांभरिया, आदि के अलावा समारोह में भादवा, भैसलाना, मढाभीमसिंह, मूण्डघसोई, मींडा, चौसला, गुढ़ासाल्ट, गोविन्दी मारवाड़, नावां, खतवाड़ी, जोबनेर सहित आस-पास व दूर दराज के के ग्राम पंचायतों के सरपंच, उपसरपंच, वार्डपंचों सहित सैकड़ों पुरूष महिला समारोह में उपस्थित थे।
इतिहास ने खुद को एक नये तेवर में सजते देखा और इस तारीख को तब से ही रैगर समाज के गाड़ेगाँवलिया परिवार ने वीरता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आप सब में से कोई अगर राजस्थान में जयपुर, नागौर जिले या सांभर आदि क्षेत्र में घूमने जायें, तो सांभर तहसील के भादवा गाँव में स्थित शहीद रामूलाल की प्रतिमा स्थल पर अवश्य जाईयेगा...रैगर समाज के सपूत की शौर्य की इस अनूठी दास्तान को करीब से देखने-जानने का मौका मिलेगा।


Wednesday, October 5, 2016

चीन का माल नहीं ख़रीदना है तो इन्हें भारत सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह चीन से आयात पर प्रतिबंध लगा दे।

रेहड़ी पटरी पर बैठ कर सस्ता माल बेचने वालों
ध्यान से सुनो।मुझे पता है आपके पास ख़बरों का कूड़ेदान यानी अख़बार पढ़ने और चैनल देखने का वक्त नहीं है।जिनके पास फेसबुक और ट्वीटर पर उल्टियाँ करने का वक्त हैं वो आपके माल की जात पता करना चाहते हैं।ज़ोर शोर से अभियान चला रहे हैं कि इस दिवाली चीन का माल नहीं ख़रीदेंगे।पाकिस्तान का साथी चीन को सबक सीखाने के लिए इन लोगों ने आपके पेट पर लात मारने की योजना बनाई है।
थोक बाज़ार से अपना माल खरीद कर आप अपने अपने ज़िलों और क़स्बों की तरफ निकल चुके होंगे। चीन का माल आपकी गठरी में आ गया होगा कि इस दिवाली कुछ कमाकर बच्चों के नए कपड़े बनवायेंगे। बच्चों की फीस भरेंगे। फर्ज़ी राष्ट्रवादियों की नज़र आपकी कमाई ख़त्म करने पर है। ये लोग नुक्कड़ पर बैठी उस महिला की कमाई पर नज़र गड़ाए बैठें जो हज़ार दो हज़ार की लड़ियाँ फुलझड़ियाँ बेचकर अपने नाती-पोतों के लिए कुछ कमाना चाहती है।
चीन का माल नहीं ख़रीदना है तो इन्हें भारत सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह चीन से आयात पर प्रतिबंध लगा दे। भारत में काम कर रही चीन कंपनियों को भगा दे। कारोबारियों का गला पकड़े कि वे चीन का माल न लायें।अरबों रुपये उनके भी दाँव पर लग गए हैं मगर वे तो छोटे दुकानदारों को बेच कर निकल चुके हैं। फिर जो माल बचा है उसे मंडी में जला कर दिखा सकते हैं कि वो राष्ट्रवाद के आगे पैसे की परवाह नहीं करते। क्या ऐसा होगा? कभी नहीं होगा लेकिन मोहल्ले में जो आपने ‘पुलिस को कुछ ले देकर’ पटरियाँ लगाई हैं कि इस दिवाली कुछ कमायेंगे,उन पर इन लोगों की नज़र है।
चीन के ख़िलाफ़ अभियान ही चलाना है तो यह भी चले कि किस किस कंपनी का निवेश चीन में है।पूरी लिस्ट आए कि इनका माल नहीं ख़रीदेंगे और ख़रीद लिया है तो उसे कूड़ेदान में फेंक देंगे।उन कंपनियों से कहा जाए कि अपना निवेश वापस लायें ।अपने माल का आर्डर कैंसल करें।भारत में जहाँ जहाँ चीन है उसे खदेड़ देना चाहिए।सरकार से बयान दिलवाना चाहिए कि वे चीन के माल का बहिष्कार कर रहे हैं इसलिए कंपनियाँ वहाँ के लोगों से कारोबार न करें। वहाँ से माल लाकर यहाँ के लोगों को न बेचें।
क्या ऐसा होगा? राष्ट्रवाद के नाम पर सिर्फ ग़रीब को ही जान और माल का इम्तहान क्यों देना पड़ता है? आपने जो माल ख़रीदा है वो बेशक चीन का होगा लेकिन पैसा तो आपका है। उस माल का मालिकाना हक़ आपका है। अगर इन फेसबुकिये राष्ट्रवादियों को चीनी माल से इतनी नफरत है तो ये अपने घरों से पहले से ख़रीदे गए चीन माल बाहर निकालें और उनकी होलिका जला दें।अपना स्मार्ट फोन क्यों नहीं शहर के मुख्य चौराहे पर फेंक देते हैं?सिर्फ दिवाली के वक्त ग़रीब दुकानदारों के ख़िलाफ़ ये साज़िश क्यों हो रही है?ये राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि पूरी योजना है कि कैसे इसी के नाम पर ग़रीबों के सवाल को ग़ायब कर दिया जाए। ग़रीब को ही ग़ायब कर दिया जाए।
अगर चीन के माल का विरोध करना ही है तो ऐसा करने जा रहे उन लोगों से गुज़ारिश है कि चीन माल बेच रहे दुकानदारों को घाटा न होने दें।उनसे माल ख़रीदें और फिर होलिका जला दें।जिन लोगों से आप माल लेकर आये हैं,उनका तो काम हो गया है।उन्हें तो पैसा मिल गया है। राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी हर कमियों को ढँकने वाले ये लोग कैसे आपकी पेट पर लात मार सकते हैं? सरकार ने चीन से कारोबार करने के लिए बहुत सी नीतियाँ बनाई होंगी। क्या वे सब भी रद्द की जा रही हैं?
सावधान रहियेगा। चीन के नाम पर आपका घर जलाया जा रहा है। अमरीका ने जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिरा कर लाखों लोगों को मार दिया था। वही जापान आज अमरीका को ट्योटा कार बेच रहा है। पाकिस्तान से अभी तक बाकी कारोबार चल ही रहा है। उसके रद्द होने का औपचारिक एलान नहीं हुआ है तो चीन के माल के बहिष्कार क्यों हो रहा है?
इसलिए जो ग़रीब हैं वो यह समझें कि कुछ लोग राष्ट्रवाद के नाम पर वीडियो गेम खेल रहे हैं।आपकी आवाज़ वैसे ही मीडिया से बेदख़ल कर दी गई है।अब आपको पटरी से भी ग़ायब करने के लिए कभी चीन तो कभी पाकिस्तान के माल के विरोध का शिगूफ़ा छोड़ा जा रहा है।
आपका
रवीश कुमार
मैं जो लिखने जा रहा हूँ, उसका कारण मूल कारण एक प्रेस विज्ञप्ति है जो २८ सितम्बर २०१६ को जारी हुई और मैंने उसे शेयर भी किया था|
यह मूल प्रेस विज्ञप्ति प्रेस सूचना ब्यूरो की साईट पर उपलब्ध है| यह उस तथ्य के बारे में है जिसे हम सब जानते और उसका फेसबुकिया विरोध भी करते हैं| दिवाली के समय विदेशी विशेषकर चीन के पटाखों की बिक्री धूम धड़ाके से होती है| सब लोग आसानी से खरीदते भीं हैं| मगर चिंताजनक रूप से यह विज्ञप्ति कहती है - सरकार को विदेशी मूल के पटाखों की बड़ी मात्रा में आयात की सूचना/शिकायत मिलती हैं| शायद यह सूचना और शिकायत प्राप्त करना सरकार के लिए रोजमर्रा का काम है|
आगे यह विज्ञप्ति कहती है – इन पटाखों का आयात रिस्ट्रिक्टेड है और भारत सरकार ने आज तक पटाखों के आयात का कोई लाइसेंस किसी को भी नहीं दिया है| कम से कम २००८ में नियम बनने के बाद से तो किसी को यह लाइसेंस नहीं मिला है|
आश्चर्यजनक रूप से यह विज्ञप्ति विदेशी मूल के पटाखों की बिक्री की सूचना निकट के पुलिस थाने को देने की कहकर समाप्त हो जाती है|
अगर किसी को पटाखा आयात की अनुमति नहीं तो उनका आयात कैसे होता है? इसके उत्तर में विज्ञप्ति कहती है कि झूठे डिक्लेरेशन देकर आयात किया जाता है| किस तरह के यह झूठ होते होंगे? क्या उन झूठों को पकड़ने की कोई कार्यवाही हुई होगी? क्या उन झूठों पर विश्वास करने के लिए सीमा शुल्क अधिकारीयों को साम – दाम से राजी किया जाता है या वो भी देश के जनता की तरह भोले भाले हैं?
जब झूठे डिक्लेरेशन देकर पटाखे आयात हो जाते हैं तो राम जाने क्या क्या आयात हो जाता होगा|
आगे बहुत से प्रश्न है मगर मेरी अपनी सीमायें है... कम लिखा ज्यादा समझना की तर्ज पर लिखना बंद करना चाहता हूँ|

दोस्त मुझे नहीं पता की झालर अच्छा या दिया ..... इतना जरूर पता है की मध्यमवर्गीय परिवार से होने के नाते हमारी जिंदगी कमाई से कम और बचत से जायदा चलती है। दिया जलाने के लिए दिये मे तेल डालना पड़ता है और अगर बाजार का अनुभव मेरा सही है तो सबसे सड़ा हुआ तेल भी 130 रुपये लीटर है। तो क्या खाएं और क्या जलाएँ। ये दर्द वो ही समझ सकता है जो महीने आखिरी दिन बड़ी बेसबरी से तनख्वा का इंतज़ार करता है ताकि घर मे खाने का जो स्वाद महीने के आखिर मे खतम हो चुका है वो थोड़ा बढ़ जाए ......... अब बात थोड़ा झालर की तो मई अगर सही समझता हूँ तो प्रतिबंध लगा कर समस्या का समाधान नहीं दिखता मुझे ... अगर ऐसा होता तो जेल जाने वाला व्यक्ति सुधार जाता और मार खाकर हर बच्चा सीख जाता या सा देने से लोग सुधार जाते, अगर पेड़ बड़ा हो रहा है तो डलियाँ काटने से उसके बढ्ने पर कोई खास असर नहीं होगा काम जड़ों पर करना होगा शायद यही बात रवीश भाई कहना चाहते हैं। अगर चीन जैसे देश का बहिष्कार करना है तो खुद के समान को सस्ता करना शुरू करो उसे लोगों के पहुँच तक लेजाओ लोग खुद ब खुद अपने घर का समान खरीदना शुरू कर देंगे। घर मे दाल खानी महंगी होने लगेगी तो लोग बाहर की सस्ती घटिया दाल ही खाएँगे क्यों की और कोई चारा ही नहीं है .... दिया बनाना और फिर उसे बेचने मे कितनी मुश्किलें है और किसी भी थोक की दुकान मे जादा समान खरीद कर छोटे डुंकान मे आसानी से बेचने के अंतर को अगर नहीं समझेंगे तो शायद ऐसे ही तुलना करेंगे जैसे कर रहे हैं .... दिया बनाने के लिए एक खास तरह की बालू वाली मिट्टी चाहिए फिर उसे पूरे दिन भीगा कर मसल कर फिर गीला छोड़ कर फिर मसल कर तैयार किया जाता है उसके बाद उसे चाक पर चढ़ा कर कच्चा दिया बनाते हैं फिर कोयले के चूल्हे पर पकने के लिए डालते हैं कुछ घंटे पकने के बाद वो बिकने के लिए तैयार होता है। हम खुद को सोचें अगर हमे दिया बनाकर बेचना पड़े और झालर खरीद कर बेचना हो तो हम खुद क्या चुनेंगे ये ध्यान मे रखते हुए की ये मौसम केवल साल मे एक ही बार आता है ........... रवीश की बात की गहराई को समझना होगा ... सरकार की क्या मंशा है ये मई नहीं बता सकता लेकिन मोदी जी की आड़ लेकर जो लोग अपना धंधा चमकाना चाहते हैं उनके षड्यंत्र को समझना होगा ... मोदी जी के नाम से internet पर आने वाली हर पोस्ट उनके विचार नहीं बताती ....... अगर हम ये नहीं समझेंगे तो जिस तरह विज्ञान का गलत इस्तेमाल होता है उसी तरह मोदी जी के अच्छे कामों का गलत इस्तेमाल करने को हमारा सहयोग मिल जाएगा