Tuesday, February 28, 2017

किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों।

आजादी के 69 साल बाद भी हमारे देश का नागरिक आजाद नहीं है। देश आजाद हो गया, लेकिन देशवासी अभी भी बेड़ियों के बन्धन में बन्धे हैं। ये बेड़ियां हैं अज्ञानता की, जातिवाद की, धर्म की,आरक्षण की, गरीबी की, सहनशीलता की,मिथ्या अवधारणाओं की आदि आदि।
किसी भी देश की आजादी तब तक अधूरी होती है, जब तक वहां के नागरिक आजाद न हों। आज क्यों इतने सालों बाद भी हम गरीबी में कैद हैं, क्यों जातिवाद की बेड़ियां हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं?, क्यों आरक्षण का जहर हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है? क्यों धर्म जो आपस में प्रेम व भाईचारे का संदेश देता है वही, आज हमारे देश में वैमनस्य बढ़ाने का कार्य कर रहा है, क्यों हम इतने सहनशील हो गये हैं कि कायरता की सीमा कब लांघ जाते हैं, इसका एहसास भी नहीं कर पाते?
क्यों हमारे पूर्वजों द्वारा कही बातों के गलत प्रस्तुतीकरण को हम समझ नहीं पाते? क्यों हमारे देश में साक्षरता आज भी एक ऐसा लक्ष्य है जिसको हासिल करने के लिए योजनाएं बनानी पड़ती हैं? क्यों हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षित एवं योग्य युवा विदेश चले जाते हैं। आज हम एक युवा देश हैं, जो युवा प्रतिभा इस देश की नींव है वह पलायन को क्यों मजबूर है?
क्या वाकई में हम आजाद है? क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? आज आजादी के इतने सालों बाद भी हम आगे न जा कर पीछे क्यों चले गए वो भारत देश जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था जिसका एक गौरवशाली इतिहास था, उसके आम आदमी का वर्तमान इतना दयनीय क्यों है? क्या हममें इतनी क्षमता है कि अपने पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना कर सकें और समझ सकें।
दरअसल, जीवन पथ में आगे बढ़ने के लिए बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इतिहास गवाह है युद्ध सैन्य बल की अपेक्षा बुद्धि बल से जीते जाते हैं।
किसी भी देश की उन्नति अथवा अवनति में कूटनीति एवं राजनीति अहम भूमिका अदा करते हैं। पुराने जमाने में सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी, तो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए बाहुबल एवं सैन्य बल का प्रयोग होता था। विजय रक्त रंजित होती थी।
जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया। मानव व्यवहार सभ्य होता गया, जिस मानव ने बुद्धि के बल पर सम्पूर्ण सृष्टि पर राज किया आज वह उसी बुद्धि का प्रयोग एक दूसरे पर कर रहा है।
कुछ युद्ध आर-पार के होते हैं, आमने-सामने के होते हैं, जिसमें हम अपने दुश्मन को पहचानते हैं, लेकिन कुछ युद्ध छद्म होते हैं, जिनमें हमें अपने दुश्मनों का ज्ञान नहीं होता। वे कैंसर की भांति हमारे बीच में हमारे समाज का हिस्सा बन कर बड़े प्यार से अपनी जड़े फैलाते चलते हैं और समय के साथ हमारे ऊपर हावी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।
इस रक्तहीन बौद्धिक युद्ध को आप बौद्धिक आतंकवाद भी कह सकते हैं। कुछ अत्यंत ही सभ्य दिखने वाले पढ़े-लिखे सफेद पोश तथाकथित सेकुलरों द्वारा अपने विचारों को हमारे समाज हमारी युवा पीढ़ी हमारे बच्चों में बेहद खूबसूरती से पाठ्यक्रम, वाद विवाद, सेमीनार,पत्र पत्रिकाओं, न्यूज़ चैनलों आदि के माध्यम से प्रसारित करके हमारी जड़ों पर निरन्तर वार किया जा रहा है।
यकीनन इस प्रकार तर्कों को प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी उन्हें सही समझने की भूल कर बैठता है। बौद्धिक आतंकवाद का यह धीमा जहर पिछले 69 सालों से भारतीय समाज को दिया जा रहा है और हम समझ नहीं पा रहे।

Monday, February 27, 2017

रैगर समाज के शहीद श्री रामू लाल गाड़ेगाँवलिया की शौर्य गाथा

राजस्थान की मिट्टी वीरो के शौर्य और बलिदान के लिए मशहूर है। यहां के योद्धाओं की गाथाएं आज भी बड़े गर्व से सुनाई जाती हैं। आज हम राजस्थान के भादवा गाँव के ऐसे ही वीर सपूत की गाथा याद कर रहे जो अपने जीवन को देश के लिए कुर्बान कर देने वाला, पल-प्रति-पल मौत के साये में बैठे रहने वाला, अपने घर-परिवार से दूर नितांत निर्जन में कर्तव्य निर्वहन करने वाला जाँबाज़ भारत माता के वीर सपूत श्री रामू लाल गाड़ेगावलिया की l
बात पुरानी तो है, लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं कि उसे भूला दिया जाये। बस बीस साल पहले 25-26 मई 1997 की ही तो बात है... जब जम्मू कश्मीर के डोडा जिले में वीर सपूत भारत माता के लाल रामू लाल गाड़ेगावलिया ने दुश्मन के गोले, बारूद और तोपों का सामना करना और चुन-चुन कर पाकिस्तानी घुसपैठियों का सफाया करना शुरू कर दिया था । वो गोलियों की बौछार से डरने वाला नहीं था ये वीर सिपाही अपनी टुकड़ी के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा, जहाँ दुश्मन घात लगाये ऊँची चोटी पर बैठे इस ताक में थे कि कब उन्हें कोई भारतीय जवान दिखे, ऐसे में ये वीर सिपाही अपनी जान की परवाह किये बिना आगे बढ़ता रहा। हमला करते हुए उन्होंने दुश्मन के दो आतंकवादियो को को मार गिराया,  इसी दौरान उनके दुश्मन की गोलियां लगीं तथा देश की सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगति को प्राप्त हुए l
वीर सपूत शहीद रामू लाल गाड़ेगावलिया का जन्म जयपुर जिले के सांभर तहसील के भादवा गाँव में श्री हरनाथ जी गाड़ेगावलिया व् श्रीमती मांगी देवी के घर 1 जुलाई 1972 को जन्मे । आपने अपनी प्रारम्भिक एव माध्यमिक शिक्षा भादवा से की 12 वीं भेसलान से और बी ए राजकीय शाकम्भरी महाविधालय सांभर से 1993 में उतीर्ण की । शहीद के छ भाई व् एक बहिन है बड़े भाई भंवर लाल गाड़ेगावलिया अध्यापक है तथा तीन अन्य भाई में से एक पंजाब में रोजगार करते एक राज पुलिस में कास्टेबल तथा फोज में कार्यरत है । शहीद 9 फरवरी 1994 इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस फोर्स में देश की सेवा करने के लिए भर्ती हुए थे ।
दिनाक 8 मई 2016 रविवार को शहीद रामूलाल की प्रतिमा का अनावरण केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने किया। मंत्री, विधायक व सरपंचों ने मूर्ति पर पुष्प चक्र अर्पित किए। इस दौरान केन्द्रीय सुरक्षा बल के कमांडों ने सलामी दी। कार्यक्रम के दौरान कर्नल राठौड़ व विधायकों सहित सांभर विधानसभा क्षेत्र से आए सरपंचों ने शहीद रामूलाल की माता मांगी देवी का शॉल ओढाकर सम्मान किया व भाइयों का भी किया सम्मान किया। प्रतिमा का अनावरण के बाद समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री कर्नल राठौड़ ने कहा जो शहीद देश के सम्मान की रक्षा के लिए आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हो जाते हैं। उन्हें समाज की आने वाली पीढिय़ां हमेशा याद करेगी। फुलेरा विधायक निर्मल कुमावत ने कहा कि रामूलाल के परिवार के चार लोग आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कराने के प्रयास करने का आश्वासन दिया।
इस अवसर पर निवाई (टोंक) विधायक हीरा लाल रैगर, धोद (सीकर)  विधायक गोर्धन लाल वर्मा, राम सहाय वर्मा राष्टीय महासचिव अखिल भारतीय रैगर महासभा, राष्टीय प्रचार सचिव मुकेश कुमार गाड़ेगावलिया पत्रकार अखिल भारतीय रैगर महासभा, डॉ एस के मोहंपुरिया प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय रैगर महासभा, जोबनेर चेयरमैन ज्ञान चंद जाजोरिया समारोह अध्यक्ष फुलेरा विधायक निर्मल कुमावत, फुलेरा नगरपालिका अध्यक्ष नृसिंग नारनोलिया, राजस्थान प्रदेश महासचिव बीरबल बुनकर, सांभर प्रधान बबली कंवर, जयपुर जिला परिषद सदस्य मंजू कुमावत, रेनवाल नगरपालिका अध्यक्ष सुमन कुमावत, सांभर नगर पालिका अध्यक्ष विनोद सांभरिया, आदि के अलावा समारोह में भादवा, भैसलाना, मढाभीमसिंह, मूण्डघसोई, मींडा, चौसला, गुढ़ासाल्ट, गोविन्दी मारवाड़, नावां, खतवाड़ी, जोबनेर सहित आस-पास व दूर दराज के के ग्राम पंचायतों के सरपंच, उपसरपंच, वार्डपंचों सहित सैकड़ों पुरूष महिला समारोह में उपस्थित थे।
इतिहास ने खुद को एक नये तेवर में सजते देखा और इस तारीख को तब से ही रैगर समाज के गाड़ेगाँवलिया परिवार ने वीरता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आप सब में से कोई अगर राजस्थान में जयपुर, नागौर जिले या सांभर आदि क्षेत्र में घूमने जायें, तो सांभर तहसील के भादवा गाँव में स्थित शहीद रामूलाल की प्रतिमा स्थल पर अवश्य जाईयेगा...रैगर समाज के सपूत की शौर्य की इस अनूठी दास्तान को करीब से देखने-जानने का मौका मिलेगा।