Wednesday, October 5, 2016

SHABD

1.पूनम माटिया टुकड़ो में बाँट देता है , पूरा होने नहीं देता । मुमकिन है जीत जाऊँ मैं , जिस लम्हा जोड़ लूँ ख़ुद को ।
2. डॉ अंजू सुमन साधक ममता की अब हो गयी, है ये कसी शक्ल । मात पिता करने लगे, आरुषियों के कत्ल ।।
3. मनजीत कौर मीत” “माँ दिल डरता है अब तो , अब तो सुन खबरे बदकारी की , कोमल कमसिन तू क्या जाने नजरें इन मक्कारों की ।
4. सुनीता पाहूजा मुझे पंख देकर उड़ना सिखाया तुमने, छु लूँ आसमान ये हौसला दिलाया तुमने , अब मेरी इन ऊंचाइयों से डरना न तुम , अब मेरे ये पंख देखो कतरना न तुम ।
5. “सृजन सेकी संपादिका मीना पाण्डेय लेके चल जिंदिगी बचपन के गाँव में, संदली फिज़ाओं में पीपल की छांव में ।
6. डॉ जेन्नी शबनम पर्दे की ओट से इस तरह झाँकती है खिड़की मानो कोई देख न ले मन में आस भी और चाहत भी / काश कोई देख न ले ।
7. श्यामा अरोड़ा समझ कर हीन अपने पर स्वयं अन्याय न मत करिए, तुम्हारी शक्ति सारा विश्व चरणों में झुका देगी , उठो जागो तुम्हारे जागरण का वक्त आया है । तुम्हारी चेतना सोई मनुजता को जागा देगी ।
8. सुप्रिया सिंह वीना” – माँ की ममता का अमर कोश / कभी मिटा सका क्या मृत्युबोध / तेरी आँचल की छाया में / स्वछंद निडर अंजान डगर पर चलती थी ।
09. नवोदित आकांक्षा तिवारी माँ तू कितनी अच्छी है गीत सुनाया

10. निधि गौतम देख कर वीरों का जज्बा हम नतमस्तक होते हैं , इन वीरों की खातिर हम चैन से सोते हैं । -
सुन लिया, अब गुनो तो सही।
मनका अपने चुनो तो सही।
रूई अपने विचारों की तुम,
मित पहले धुनो तो सही।
हाथ में हाथ दो तो सही
साथ मैं हूँ चलो तो सही
फाड़ कर फेंक देना, मगर
ख़त को मेरे पढ़ो तो सही
आप बैठे हैं ख़ामोश क्यों
सुन रहे हैं, कहो तो सही
दो बदन, एक जां, एक रूह
कृष्ण-राधा बनो तो सही
तल्ख़ियाँ ख़त्म हो जाएंगी
कुछ कहो, कुछ सुनो तो सही
हर तसव्वुर की ताबीर हूँ
ख़्वाब तुम इक बुनो तो सही
चाँदनी, चाँद , पूनम की शब
और मैं हूँ , रुको तो सही ..........

Tuesday, September 27, 2016

ऐसा नहीं है इस संसार में ज्ञानी लोगों की कमी है

जहां तक भारतीय अध्यात्मिक विषय से जुध विद्वान लोगों का ज्ञान है वह इस बात की पुष्टि नहीं करता कि इस देश का पूरा समाजमूर्ख और रूढ़िवादी हैं जैसा कि कथित सुधारवादी मानते हैं| जिस तरह पिछले साठ वर्षों से राजनीतिसामाजिक तथा आर्थिक रूप से कुछ मुद्दे पेशेवर समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने तय कर रखे हैं उनमें कभी कोई बदलाव नहीं आया उससे तो लगता है कि वह यहां के आम आदमी को अपने जैसा ही जड़बुद्धि  ही समझते हैं। उनकी बहसें और प्रचार से तो ऐसा लगता है कि जैसे यहां का समाज बौद्धिकरूप से जड़ है और यह उन भ्रम उन विद्वानों को भी हो सकता है जो ज्ञान होते हुए भी कुछ देर अपना दिमाग इस तरह की बहसों और प्रचारित विषयों को देखने सुनने में लगा देते हैं। दरअसल जब राजनीतिसमाज सेवा और अध्यात्मिक ज्ञान देना एक व्यापार हो गया हो तब यह आशा करना बेकार है कि इन क्षेत्रों में सक्रिय महानुभाव अपने प्रयोक्तओं या उपभोक्ताओं के समक्ष अपनी विक्रय कला का प्रदर्शन कर उनको प्रभावित न करें। हम उन पर आक्षेप नहीं कर सकते क्योंकि प्रयोक्ताओं और उपभोक्ताओं को भी अपने ढंग से सोचना चाहिये। अगर आम आदमी कहीं इस तरह के व्यापारों में सेद्धांतिक और काल्पनिक आदर्शवाद ढूंढता हो तो दोष उसमें उसकी सोच का है।  जिस तरह एक व्यवसायी अपना आय देने वाला व्यवसाय नहीं बदलता वैसे ही यह पेशेवर सुधारवादी अपने विचार व्यवसाय नहीं बदल सकते क्योंकि वह उनको पद, प्रतिष्ठा और पैसा देता है|
 हांहम इसी सोच की बात करने जा रहे हैं जो हमारे लिये महत्वपूर्ण है। जिस तरह इस देह में स्थित मन के लिये दो  मार्ग है एक रोग का दूसरा योग का वैसे ही  बुद्धि के लिये भी दो मार्ग है एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। जब बुद्धि सकारात्मक मार्ग पर चलती है तबमनुष्य के अंतर्मन में कोई नयी रचना करने का भाव आने के साथ ही तार्किक ढंग से विचार करने की शक्ति पैदा होती है। जब बुद्धि नकारात्मक मार्ग का अनुसरण करती है तब मनुष्य कोई चीज तोड़ने को लालायित होता है और तर्क शक्ति  से तो उसका कोई वास्ता हीं नहीं रह जाता-वह असहज हो जाता है। यही असहजता उसे ऐसे मार्ग पर ले जाती है जहां उसका ऐसे ही भावनाओं के व्यापारी उसका भौतिक दोहन करते हैं जो स्वयं भी अनेक कुंठाओं और अशंकाओं का शिकार होते हैं और धन संचय में उनको अपने जीवन की सुरक्षा अनुभव होती है।
      अपने स्वार्थ के कारण ही आर्थिकसामाजिक तथा वैचारिक शिखर पर बैठे शीर्ष पुरुष समाज में ऐसे विषयों का प्रतिपादन करते हैं जिनसे समाज की बुद्धि उनके अधीन रहे और नये विषय या व्यक्ति कभी समाज में स्थापित न हो पायें-एक तरह से उनका वंश भी उनके बनाये शिखर पर विराजमान रहे। वह अपने प्रयास में सफल रहते हैं क्योंकि समाज ऐसे ही कथित श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण करता है। अगर कोई सामान्य वर्ग का कोई चिंतक उनको नयेपन की बात कहे तो पहले वह उसकी भौतिक परिलब्धियों की जानकारी लेते है। सामान्य लोगों की भी यही मानसिकता है कि जिसके पास भौतिक उपलब्धियां हैं वही श्रेष्ठ व्यक्ति है।
      बहरहाल यही कारण है कि बरसों से बना एक समाज है तो उसकी बुद्धि को व्यस्त रखने वाले विषय भी उतने ही पुराने हैं। मनुष्य द्वंद्व देखकर खुश होता है तो उसके लिये वैसे विषय हैं। उसी तरह उनमें कुछ लोग सपने देखने के आदी हैं तो उनको बहलाने के लिये काल्पनिक कथानक भी बनाये गये। इनमें भी बदलाव नहीं आता।
      पिछले एक सदी से इस देश में  भाषाजातिधर्मऔर क्षेत्र के नाम पर विवाद खड़े किये गये। उनका लक्ष्य किसी समाज का भला करने से अधिक उसके नाम पर चलने वाले अभियानों के मुखियाओं का द्वारा अपने घर भरना था। इनमें से कईयों ने तो अपने संगठन दुकानों की तरह अपनी संतानों को दुकानों की तरह उत्तराधिकार में सौंपे| ऐसा करते हुए वह नये देवता बनते नजर आने लगे। सच बात तो यह है कि इस दुनियां में कभी भी कोई अभियान बिना माया के नहीं चल सकता। फिर जो लोग दावा करते हैं कि वह अमुक समूह का भला कर रहे हैं उनका कृत्य देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह काम निस्वार्थ कर रहे हैं। ऐसे में बार बार एक ही सवाल आता है कि कौन लोग हैं जो उनको धन प्रदान कर रहे हैं। तय बात है कि यह धन उन्हीं मायावी लोगों द्वारा दिया जाता होगा जो इस समाज को सैद्धांतिक मनोरंजन प्रदान करने केलिये उनका आभार मानते हैं।
      अभियान चल रहे हैं। आंदोलन इतने पुराने कि कब शुरु हुए उनका सन् तक याद नहीं रहता। आंदोलन के मुखिया देह छोड़ गये या इसके तैयार हैं तो उनके परिवार के पास वह विरासत में जाता है। पिता नहीं कर सका वह पुत्र करेगा-यानि समाज सेवाअध्यात्मिक ज्ञान तथा कलाजगत का काम भी पैतृक संपदा की तरह चलने लगा है।
      सत्य और माया का यह खेल अनवरत है। ऐसा नहीं है इस संसार में ज्ञानी लोगों की कमी है अलबत्ता उनकी संख्या इतनी कम है कि वह समाज को बनाने या बिगाड़ने की क्षमता नहीं रखते। वैसे भी कहीं किसी नये विषय या वस्तु का सृजन चाहता भी कौन हैअमन में लोग जीना भी कहां चाहते हैं। अमन तो स्वाभाविक रूप से रहता है जबकि  लोग तो शोर से प्रभावित होते हैं। ऐसा शोर  जो उनको अंदर तक प्रसन्न कर सके। यह काम तो कोई  व्यापारी ही कर सकते हैं। इसके अलावा लोगों को चाहिये अनवरत अपने दिल बहलाने वाला विषय! यह तभी संभव है जब उसे अनावश्यक खींचा जाये-टीवी चैनलों में सामाजिक कथानकों को विस्तार देने के लिये यही किया जाता है। यह विस्तार बहस करने के लायक विषयों में अधिक नहीं हो सकता क्योंकि उसमें तो नारे और वाद ही बहुत है। समाज को नारीबालकवृद्धजवानबीमारभूखाबेरोजगार तथा अन्य शीर्षकों के अंदर बांटकर उनके कल्याण का नारा देकर काम चल जाता है। इसके अलावा इतनी सारी भाषायें हैं जिसके लिये अनेक सेवकों की आवश्यकता पड़ती है जो सेवा करते हुए स्वामी बन जाते हैं। ऐसा हर सेवक अपनी भाषाजातिधर्म तथा क्षेत्र के विकास और उसकी रक्षा के लिये जुटा है।
      मगर क्या वाकई लोग इतने भोले हैं! नहीं! बात दरअसल यह है कि इस देश का आदमी कहीं न कहीं से अपने देश के अध्यात्मिक ज्ञान से सराबोर है। वह यह सब मनोरंजन के रूप में देखता है। सामने नहीं कहता पर जानता है कि यह सब बाजारीकरण है। यही कारण है कि कोई भी बड़ा आंदोलन या अभियान चलता है तब उसमें लोगों की संख्या सीमित रहती है। उसमें लोग  इसलिये अधिक दिखते हैं क्योंकि वहना नारों शोर होता  हैं। शोर करने वाला दिखता है पर शांति रखने वाले की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। पिछले अनेक महापुरुषों को पौराणिक कथानकों के नायकों की तरह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा हैं इतनी  सारी पुण्यतिथियां और जन्म दिन घोषित  किये गये हैं कि लगता है कि सदियों में नहीं बल्कि हर वर्ष एक महापुरुष पैदा होता है। लोग सुनते हैं पर देखते और समझते नहीं है। यह जन्म दिन और पुण्यतिथियां उन लोगों के नाम पर भी बनाये गये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के पुरोधा समझे जाते हैं जिसमें जन्म और मृत्यु को दैहिकसीमा में रखा गया है-दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी अवधारणा को यह कहकर खारिज किया गया है कि आत्मा तो अमर है। जो लोग बचपन से ऐसे कार्यक्रम देख रहे हैं वह जानते हैं कि आम आदमी इनसे कितना जुड़ा है। हालांकि इसका परिणाम यह हो गया है कि लोगों ने अपने अपने जन्म दिन मनाना शुरु कर दिया है। प्रचार माध्यमों ने अति ही कर दी है। हर दिन उनके किसी खिलाड़ी या फिल्म सितारे का जन्म दिन होता है जिससे उनको उस पर समय खर्च करने का अवसर मिल जाता है। काल्पनिक महानायकों से पटा पड़ा है प्रचार माध्यमों को पूरा जाल।
      इसके बावजूद एक तसल्ली होती है यह देखकर कि काल्पनिक व्यवसायिक महानायकों का कितना भी जोरशोर से प्रचार किया जाता है पर उससे आम आदमी अप्रभावित रहता है। वह उन पर अच्छी या बुरी चर्चा करता है पर उसके हृदय में आज भी पौराणिक महानायक स्थापित हैं जो दैहिक रूप से यहां भले ही मौजूद न हों पर इंसानों के दिल में उनके लिये जगह है। यह काल्पनिक व्यवसायिक नायक तभी तक उसकी आंखो में चमककर उसकी जेब जरूर खाली करा लें जब तक वह देह धारण किये हुए हैं उसके बाद उनको कौन याद रखता है। सतही तौर पर जड़ समाज अपने अंदर चेतना रखता है यह संतोष का विषय है भले ही वह व्यक्त नहीं होती।

Monday, May 9, 2016

करै अणूंता खट करम ओढ धरम का चादरा ।

रूंख रूखाळा आपणा बिना गरज रा सीर ।
फळ पत्ता दे आपरा सब की मेटै पीर ॥
निपट स्वारथी मांनखा तू क्यूं काटै रूंख ।
बिन पाणी छायां बिना खुद तू ज्यासी सूख ॥
दो लोटा नित का घणां बाल बिरछ म घाल ।
बडो हूय बण ज्यावसी बो थारो रखवाळ ॥
पाणी थोङा नेह घणां आ बिरछां नै बांट ।
सौ गुणी कर देवसी कदे न करसी आंट ॥
ढोर जिनावर पांखिया अ'र मिनखां री देह ।
रूंख बांटसी आपरो सबनै बरोबर नेह ॥
तपै तावङो जेठ म बरसै जाण्यूं आग ।
एक रूंख ई मोकळो लागै जाण्यूं बाग ॥
सूनी धरती आपणी थानैं कहे पुकार ।
बिरछ लगावो मानखां कर म्हारो सिणगार ॥

सूनां सूनां टीबड़ा सूनां सूनां खेत ।

उभी दिखै खेजड़ी मन भर ज्यावै हेत ।।

करै अणूंता खट करम
ओढ धरम का चादरा ।
एड़ा मिनखां सूं आंतरो
सदा रांखजे भायला ।। १ ।।
मन की मन मं रांखणी
काढ न देणी हर खठ ।
मौको आयां बोलणूं
सदा भलेरो भायला ।। २ ।।
बोली का चोखा घणा
पहरै घाबा सांतरा ।
अंतस रा काळूंस को
बेरो पड़ै न भायला ।। ३ ।।
गांठ कदे न बांधणी
बांधेड़ी माड़ी घणी ।
फूट्यां पाछैं राद ज्यूं
फोड़ा घालै भायला ।। ४ ।।
बिरथ कदे न बोलणूं
बोल्यां पैली तोल ।
मोल बणा तू बोल को
याद रांखजे भायला ।।५ ।।
सवारथ री पैड़्यां चढ्या
मनवारां करसी घणी ।
मूंडो देख पिछाणबो
घणूं कुजरबो भायला ।।६ ।।
देख पराई परगति
दुरमत कदे न पाळणी ।
दरपण बण दिख जावसी
मूंडा उपर भायला ।। ७ ।।
मन काळा तन ऊजळा
बोली का चोखा घणां ।
घात करै विश्वास सूं
चेत रांखजे भायला ।। ८ ।।
हीणां जण हांकै घणां
धरै न कोई कान ।
लांठा जण एकर भखै
तुरत सुणीजै भायला ।। ९ ।।
भायां म बसबो भलो
हुवो भलां बै दूबळा ।
दूजा जण लांठा घणां
काम न आवै भायला ।। १० ।।
हक देवो थे हाकमां ,कैवै माटी बोल ।
आ वाणी राजस्थान री घणी है अनमोल ।।
दे द् यो थे अब मांनता , करल्यो थे अब कौल
आ वाणी राजस्थान री---------------------------
मीठा मोर पपीहा बोलै अमरत जेड़ी वाणी ।
मीठा सोगर कैर सांगरी मीठा ई गुड़ धाणी ।।
मीठा लागै जिणरै मिनखां रा बोल
आ वाणी राजस्थान री
रूप सुरंगो भेष सुरंगो घणी सुरंगी नारी ।
जिणरी खातर देव सुरग रा भी जावै बलिहारी ।।
मानो म्हारी बातां नै थे अब मन की गांठ्यां खोल
आ वाणी राजस्थान री
घणां स्नेही संत अठ्यांरा घणां सुहाणां तीरथ ।
घणां रसीला लोग अठ्यांरा घणी सोवणी सीरत ।।
बाजै मंदिर मं अलगोजा झांझर ढोल
आ वाणी राजस्थान री
मायङ भाषा आपणी
थांसूं करै पुकार ।
सुध लेवो नी बालकां
कद तक रैवूं लाचार ॥
संसद मं भेळा हुया
सांसद अबकी बार ।
एक मतौ कर मांगल्यो
अनुसूची अधिकार ॥
पुरातन सूं लेयकर
आधुनिक इतिहास ।
सामै रखद्यो खोलकर
पढल्यो महानुभाव ॥
नवरस भरी वाणी अठे
मिनखां रो सिणगार ।
तेज ताप भी मोकळो
लाज शरम गळहार ॥
धन की खातर धर्म छोड नै
ठेका घाल्या दारू का
कुल मर्यादा लारैं रहगी
ठहरै क्यांकै सारू बा
छोङ आपका देश धर्म नै
दो नंबर का काम करै
इज्जत की जिंदगानी छोडी
गंडक की सी मौत मरै
डरै अणूंता भला आदमी
डरता क्यूं भी बोलै नीं
देख्यां पैली आंख्यां मींचै
मूंडो पाछै खोलै नीं
खेतां पाची सिरस्यूंङी रै
कोई पाच्या गेहूं लाल
चीणां पाच्या सांतरा रै
कोई मेथी कर दी न्यहाल
पीपळ पून्यूं सामनै रै
कोई सामी आखातीज
ब्याव मांडस्यां ई सावै रै
कोई ल्यास्यां चोखी चीज
क बैरी बरसग्यो रै
जाण्यूं आय पङ्यो रै कोई काळ
क बेटा जाट का रै
देखां कियां हुवै तू मालामाल
गळगी सारी ढूंगरियां रै
कोई काळा पङग्या बीज
बुझग्या मन का दीवळा रै म्हांका
क्यां पर काढां खीज
क बीरा नणद का रै
अबकै आच्छी आई रै आखातीज
विश्वासां की डोर टूटगी
घर मं पङगी राङ ।
हेतभाव माटी मं रळगो
ऊंची करली बाङ ॥
चौपालां अब सूनी हुगी
गायब हुया गुवाङ ।
फुलवाङी की ठौङ कंटीला
उग आया अब झाङ ॥
मिनखाचारो भूल गया सब
ले सवारथ की गांठ ।
राजनीति री रोट्यां सेकै
गेर आपस मं आंट ॥
निजरांसामी जाय शरम अब
कर न सकां उपाय ।
की - की को विश्वास करां अब
बाङ खेत न खाय ॥

एक गादङा नै मरेङो हाथी मिलगो । सोची, चलो दो तीन महिना तो आराम ऊं निकळसी । पण हाथी को मोटो चाम कियां फाटै ।
च्यारूं मेरे घूम्यो जणां मांय घुसबा जती जगां मिलगी अर गादङो मांय घुसगो ।
निरा दिनां तांय मांय बङ्यो बङ्यो खाबो करियो पण टेम सारू हाथी को चमङो सूख'र कल्डो पङगो ।
अब मांय नै भोजन नींवङ्यां पछ गादङो बारै नै निकळबा की सोची पण ओ कांई ? मांय बङ्यो जकी जगां तो भेळी हूयनै सिकुङगी । अब कांई करै बो बैठ्यो बिचार करोय हो क बीनै आदमी बोलता सुणीज्या ।
गादङो उपाय सोचनै हेलो मारियो - "अरै भाई लोगां सुणो , मैं बनदेवता हुं ई हाथी कै खोबरा म तेल चढावो तो थानै काम की बात बतास्यूं ।"
आदमी जायनै तेल ल्यार खोबरा म गेर दियो ।
अब क्यूं तेल ऊं खाल नरम हुई क्यूं गादङो तेल म चीकणूं हुयो अर बो बारै नै आयगो ।
आदमी बोल्या -"अब बतावो बनदेवता काम की बात ।"
गादङो बोल्यो -"भायो काम की बात आ है कै ठाडाई म घुसबो तो घणूं सोरो है पण निकळबो दोरो जखो ठाडाई देखनै मांय बङबा की मनचली मनां कर लिज्यो ।"

Saturday, August 29, 2015

RTI activist Raghubir Singh Gadegawnlia got ‘B’ Grade position in India in Certificate Course on RTI

DELHI: Raghubir Singh Gadegawnlia, resident of  Jawala Puri district West Delhi based RTI activist got B grade position in India in Certificate Course on RTI' launched by the Department of Personnel and Training (DoPT), Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions, Government of India (GoI). Gadegawnlia got 3rd rank in India, out of 41 students.
Certificate Course on RTI' is for various stakeholders on, both, the demand and supply sides of the RTI implementation regime. This Online Certificate Course on RTI is launched in association with the Centre for Good Governance, Hyderabad.
This Certificate Course is aimed for Public Information Officers (PIOs), Assistant Public Information Officers (APIOs), Appellate Authorities, Officials assisting the above designated officers or other public officials, Representative of Civil Society Organizations (including Media Organizations) .
The outcomes proposed for this initiative are a sound knowledge of the provisions of the RTI Act, 2005 among the people taking this course. Good understanding of the remedies available when an implementing organization fails to comply with this Act, Testing the understanding of 'Information Providers' and 'Information Seekers' using this tool for implementing this Act or exercising their right under it.
It is to be remembered that Raghubir Singh Gadegawnlia is an active member of different social organizations & giving training about RTI Act to different organizations & citizens.


Tuesday, March 24, 2015

Complaint against Shri Jai Singh,

To,                                                                                                                               Date:              
The Deputy Commissioner (West)
Revenue Department, GNCT of Delhi
Old School Building, Rampura, New Delhi – 110 035

Subject:           Complaint against Shri Jai Singh, TGT, (SST), Govt. Co-ed. Sr. Sec. School, Rajapur Khurd, (ID-1618192), Delhi on the act of willful harassment and negligence his duties 

Regarding:      SECC-2011 – Payment to Enumerator (Raghubir Singh)

Sir,

My name is Raghubir Singh, resident of B-618, JawalaPuri, Sunder Vihar, New Delhi-110087 Contact No.: 9212200559.  I had been completed work as Enumerator (EB No. 116,117,118,119) under Socio Economic and Caste Census, 2011 (Enumerator I Card Copy enclosed). I have submitted the following complete details to Mr. Jai Singh, TGT, (SST), who is deputed as Supervisor (Ward No.121) posted for this purpose in SECC, with a Xerox copy of bank passbook
My Name: RAGHUBIR SINGH
A/c No: SB01016918
IFSC Code :CORP0000476
Branch: PASCHIM VIHAR, DELHI.

As till date the payment for my work has not been credited in my bank account, I contacted one Mr. Gujral, Incharge of SECC for West District, who is a Senior Officer to Shri Jai Singh, TGT for my payment. In reply, Mr. Gujral gave me a copy of a detail (copy enclosed herewith), which reveals that the payment for my work prepared and sent to bank for clearance into an account no.085100101001252, in the name of one Ms. Meenakshi at Corporation Bank, Rajouri Garden Branch, New Delhi, instead of my name and my account no.SB01016918 at Corporation Bank, Paschim Vihar Branch, New Delhi.  In view of above i.e. due to mismatch of bank account numbers, the clearance through ECS could not be made / returned by the bank. 

So, yesterday, 23.03.2015, I contacted Mr. Jai Singh, through my mobile number to his mobile number-9213327035 nearly at the time of 07-15 pm (night) and politely requesting him to meet personally to solve the above problem / mistake done by him (Mr. Jai Singh).  In reply, through mobile conversation, he (Mr. Jai Singh), denied to give an appointment to meet him and further says that “I have lot of work pressure and therefore I will not & I cannot make any corrections in the aforesaid issue and do whatever you want” and, thereafter, he disconnected the phone conversation

After receiving such type of reply from him (Mr. Jai Singh), I could not understand that “even I gave my complete bank details to him very correctly, why he (Mr. Jai Singh) prepared the details for making the payment for my work to another person’s name instead of my name and my bank account”.   AND further I could not understand that “even after his deliberate willful mistake in the above issue, why he does not like to correct the same”.

In view of all above, I am not able to get my payment till date since November, 2014 and, therefore, the above-said act as intentionally done by Mr. Jai Singh is reflect as disobedience / willful negligence to his duties.     Hence, I request you to kindly take necessary action against Mr. Jai Singh, TGT, Govt, Co-ed. Sr. Sec. School, Rajapur Khurd, (ID-1618192), Delhi under the relevant rules and also direct him to prepare the required correct payment to me for my work, urgently.       A reply on the above issue is solicited.
Yours faithfully,



 (Raghubir Singh )
B-618, JawalaPuri, Sunder Vihar,
New Delhi-110087.

Contact No.: 9212200559

Tuesday, November 18, 2014

Mr. Muktesh Chander IPS
Mr. Muktesh Chander joined Indian Police Service in 1988 and has remained posted to several
places including DIG Goa and Addl. Commissioner of Police, Crime, and Traffic Delhi and IG
Daman Diu. He has served as Centre Director Cyber Division and National Critical Information
Infrastructure Protection Centre in NTRO under Prime Ministers’ Office. He was specially
selected as United Nation Police Observer and has monitored, trained and advised police in
Bosnia and Herzegovina in Europe for 1 year.
He has been awarded President’s Police Medal for meritorious service, President’s Police
Medal for distinguished service, Police Medal for Hard Duty, UN Service Medal and 50th
Anniversary of Independence Medal. He has written a number of articles on Cyber Crime and
related topics, which have been published in various prestigious journals and newspapers. He is
a resource person for premier institutes in India. He was member secretary of the Joint Working
Group which formulated “Guidelines for Protection of National Critical Information
Infrastructure”.
He graduated in Electronics and Telecommunication Engineering from Delhi University. Mr.
Muktesh Chander also holds a law degree from Delhi University, diploma in Human Resource
Management, Diploma in Cyber Laws and Masters Degree in Criminology & Forensic Science
and has submitted his Ph.D. thesis in Information Security Management to I.I.T., Delhi. He has
also done Hostage Negotiation course at Louisiana State Police Academy, USA and Law
Enforcement Executive Development Course with FBI, Los Angeles, USA.
Apart from this Mr. Muktesh Chander holds a license of Amateur Radio. He is also life member
of Amateur Radio Society of India. During his spare time he plays on flute and mouth organ and

listens to classical and semi classical music.